शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2019

।।मनहरण घनाक्षरी।।

।।मनहरण घनाक्षरी।।
रोज रोज गारी देत, सबके खबर लेत,
करके चारी चुगली,बानी ला लगाय हे।
सुने न काकरो बात,आथे घर मा वो रात,
करके जी मनमानी, पीके दारू आय हे।
बोली देख लड़खात,गोड़ हाँथ ल हलात,
पीके सिगरेट अब,धुआँ ल उड़ाय हे।
चिंता नइये धन के, करे अपने मन के,
भरे लालच मन मा, आँखी ल गड़ाय हे।

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