मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

एक कार

*हास्य कविता
।। एक कार।।
मैंने बनाया है एक ऐसा कार,
जिसका करूँगा 2020 में अविष्कार।
उस कार पे सबकी नजरें टिकी है,
कार मेरे पहले से ही सवा दो लाख में बिकी है।
दाम बिल्कुल इसका खरा है,
सबके सर में चढ़कर पड़ा है।
इस कार की सीट ऐसी है,
बिल्कुल घर की सोफे सेट जैसी है।
खिड़कियाँ इसकी हवा का झोंका है,
हर कोई ने इस कार को रोका है।
कार में चढ़ने को बेताब है सवारी,
मेरे कार की वजन है बहुत भारी।
इसकी हर एक चीज प्लास्टिक का सेट है,
कार मेरा बिल्कुल धक्का प्लेट है।
दीवानों का दीवाना इस कार का आईना है,
इसलिए हर कोई इस कार का दीवाना है।
कार मेरा फैसन डिजाइनों से भरपूर है,
एक बार ठोका जाये तो बिल्कुल चूर चूर है।
कार कहीं ठोका जाये तो द एंड कर दूँगा,
पुनः इस कार की हैंडिल मैं खुद पकडूँगा।
चलाऊंगा मैं इसे धरती से लेकर आसमान तक,
बैठाऊँगा मैं इसमें सवारी से लेकर समान तक।
हर जगह मेरे चर्चा और मेरा नाम होगा,
फिर कारों का अविष्कार करना मेरा काम होगा।

रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद पोस्ट समोदा रायपुर छत्तीसगढ़

बुधवार, 29 जुलाई 2020

मुक्तक के नियम

*।। मुक्तक क्या है।।* 

जो काव्य विधा भाव के दृष्टिकोण से अपने आप में पूर्ण हो वह मुक्तक कहलाता है।

जैसे *- दोहा ,शेर आदि* 
 दो पंक्ति के दोहा अपने आप में कथन या भाव की दृष्टिकोण से पूर्ण होता है।ठीक उसी प्रकार से शेर भी दो पंक्ति के माध्यम से कह देता है। इसलिए यह सैद्धांतिक रूप से मुक्तक है।किन्तु यह बात ध्यान देने योग्य है, वर्तमान में प्रचलित मुक्तक इससे भिन्न है।लोग बाग जिसे मुक्तक समझ रहे है वह उर्दू साहित्य से तालुकात रखता है।उर्दू साहित्य के गजल के मतला के साथ मतलासानी चिपका हो तो उसे मुक्तक कहते है।

गजल के प्रथम दो पंक्ति को मतला और उसके बाद आने वाले दो पंक्ति को मतलासानी कहा जाता है।
 *मुक्तक* एक समान मात्रा भार और समान लय (समान बहर) वाले चार पदों की रचना है जिसका *पहला*, *दूसरा* और *चौथा* पद तुकान्त तथा *तीसरा* पद  अतुकान्त होते है और जिसकी अभिव्यक्ति का केंद्र अंतिम दो पंक्तियों में होता है।

 *मुक्तक के लक्षण*
1. इसमें चार पद होते है।

2. चारों पदों के मात्रा भार और लय(या बहर) समान होते है।

3. पहला दूसरा और चौथा पद में रदीफ काफिया अर्थात सैम तुकान्तता होता है।

4. जबकी तीसरा पद अनिवार्य रूप से अतुकान्त होते है।

5. कथ्य कुछ इस प्रकार होता है कि उसका केंद्र बिंदु उसके अंतिम दो बिंदुओं में रहता है।जिनके पूर्ण होते ही पाठक/श्रोता वाह करने पर बाध्य होता है।

6. मुक्तक की कथन कुछ कुछ गजल के शेर या दोहा छंद जैसी होती है,इसे वक्रोक्ति व्यंग्य या अंदाज ए बयाँ के रूप में देख सकते है।

 *मुक्तक* में हमें तीन शब्दों से परिचित होना आवश्यक है।
       
      1. *रदीफ* 
रदीफ अरबी शब्द है इसकी उतपत्ति " रद"  धातु से मानी गयी है। रदीफ का शाब्दिक अर्थ है पीछे चलने वाला या पीछे बैठा हुआ।
गजल के संदर्भ में रदीफ उस शब्द या समूह को कहते है जो मतला ( पहला शेर ) के मिसरा ए उला (  पहली पंक्ति ) और मिसरा ए सानी

 *उदाहरण* :-
हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए।
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
मेरे सीने में नही तो तेरे सीने में सही।
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।     (दुष्यंत कुमार जी की रचना है )
प्रत्येक पंक्ति के अंत मे जो शब्द आता है उसे रदीफ कहते है।
जैसे इसमें  अंतिम शब्द  चाहिए आया है वह इसका रदीफ कहलायेगा ।

2. *काफिया* 

काफिया अरबी शब्द है जिसकी उत्पत्ति "  कफु "  धातु से मानी जाती है। काफिया का शाब्दिक अर्थ है जाने के लिए तैयार। गजल के संदर्भ में काफिया वह शब्द है जो सम तुकांता के साथ हर शेर में बदलता रहता है, यह गजल के हर शेर में रदीफ के ठीक पहले स्थित होता है जबकि मुक्तक पहले, दूसरे, एवं चौथे पंक्ति में। 
जैसे  
पिघलनी, निकलनी, और जलनी में अनी शब्द आया है।

 *उदाहरण* 

आँसुओं का समंदर सुखाया गया।
अंत में बूँद भर ही बचाया गया।
बूँद वह गुनगुनाने लगी ताल पर।
तो उसे गीत में ला छुपाया गया।

इसमें  सुखाया, बचाया और  छुपाया शब्द में आया शब्द आया है वह काफिया है।
  
    *बहर* 
मात्राओं के क्रम को ही बहर कहा जाता है। जिस प्रकार हिन्दी में गण होता है उसी प्रकार उर्दू में रुकन होता है।

   *मात्रा* 
मात्रा दो प्रकार की होती है
(1)  एक मात्रिक इसे हम एक अक्षरिय व एक हर्फ़ी व लघु व लाम भी कहते है और 1 से अथवा हिन्दी कवि 1से भी दर्शाते है।
(2) इसे हम दो अक्षरिय व दो हरुफी व दीर्घ व गाफ भी कहते है।

 *एक मात्रिक*
हिंदी वर्णमाला में
अ, उ,इ, ऋ और इससे जुड़े व्यंजन 
अ, क,ख, कृ खृ,कँ, खँ

 *दो मात्रिक* 
आ,ई,ऊ, ए ,ऐ औ अं
इससे जुड़े हुए व्यंजन जैसे
का,की, कू,के, कै,को,कौ कं आदि 

आधा वर्ण का खुद का कोई भार नही होता किन्तु जिससे जोड़कर इसे बोला जाता है उसका भार दीर्घ या गाफ हो जाता है।
 *उदाहरण* 
 *राम* - 21
 *श्याम* - 21
 *कृष्ण* - 21
 *तुम्हारा* -122
 *हमारा* -122
 *संसार* -221
 *खुशी* -12
 *कमल* -111 (12) जबकि इसी शब्द को  उच्चारण की दृष्टि से मल को शास्वत गुरु मानकर 2 कर दिया जाता है।
 *उधर*  -111(12)

आँसुओं का समंदर सुखाया गया।
2  1  2  2   12 2   1 22   12
अंत में बूँद भर ही बचाया गया।
21  2  21   2  2  122   12
बूँद वह गुनगुनाने लगी ताल पर।
21  2    2122   12   21  2
तो उसे गीत में ला छुपाया गया।
2   12  21  2  2  122   12

जब चारो पंक्ति की मात्रा क्रम एक समान हो बहर एक समान हो 
तभी वह मुक्तक होगा।
सभी के अंत में रदीफ तीन पंक्तियों में रदीफ आयेगा और एक पंक्ति रदीफ मुक्त होगा और रदीफ के पहले काफिया  आयेगा तो उसे कलात्मक रूप से मुक्तक कहेंगे।



उपरोक्त जानकारी गुरु भैया रमेश सिंह चौहान के अनुसार.....

संग्रहनकर्ता:- राजेश कुमार निषाद

शनिवार, 11 जुलाई 2020

।।भोले बाबा।।

।। चौपाई छंद ।।
महिना सावन जब जब आथे, भोले बाबा सबो मनाथे।
होवत बिहना मंदिर जाथे,जस ला तोरे सबझन गाथे।।

बेल पान के महिमा जाने,फूल धतूरा संगे लाने।
होवत बिहना  मंदिर जाथे,करके पूजा सबो चढ़ाथे।।

डमरू धारी अवघट दानी,बाबा हावय बड़ बरदानी।
जउन शरण मा ओकर जाथे,मन वाँछित फल ओहर पाथे।।

राख अंग मा काने बाला, पहिरे हावय बघवा छाला।
नंदी बइला करे सवारी,बाबा हावय डमरू धारी।।

तोर जटा ले निकले गंगा,देखत होथे मन हा चंगा।
अरजी हमरो सुनले बाबा,नइ जा पावन कांसी काबा।।

रचनाकार :- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद रायपुर छत्तीसगढ़ 

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

।।मौसम का मिजाज।।

विषय - मौसम का मिजाज
।।विधा - दोहा ।।

देखो मौसम आज का,कितना बदले रूप।
अपनी मनमानी करे,कभी छाँव तो धूप।।

सावन महिना देख लो,छाय घटा घनघोर।
उथल पुथल सब ओर है,गिरता पानी जोर।।

 मचले मन संगीत में,सावन झूला झूल।
मौसम देख मिजाज की,खिलती कलियाँ फूल।।

गीली गीली है धरा,मन में छाय उमंग।
आसमान में है छटा, इंद्रधनुषी रंग।।

पलपल बदलत जात है, कैसा है ये रीत।
लगे सुहावन है धरा,सुनले मन के प्रीत।।

रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद

बाल कविता मुर्गा

।। बाल कविता - मुर्गा ।।

कुकडूू कु करके बाँग लगाता,
रोज सुबह हमें जगाता।
रंग बिरंगे पँखो वाले,
चले अकड़ के चोंच निकाले।
कानों में है रस घोलता,
चढ़के छत पर वह बोलता।
सुबह हो गयी सब उठ जाओ,
छोड़ो बिस्तर अब नींद भगाओ।
गली गली में घूमता फिरता,
नही किसी से कुछ कहता।
कचरों में जाकर दाना ढूँढता,
खाना उसको यहीं पर मिलता।
मुर्गा लगे सबको प्यारा,
करता है ओ काम हमारा।
सुबह सुबह अलार्म बजाता,
रोज हमें नींद से जगाता।

रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद
रायपुर छत्तीसगढ़।

रविवार, 5 जुलाई 2020

शंकर छंद

।।शंकर छंद।।

बरसत हावय रिमझिम पानी,खुशी मन मा  छाय। 
उमड़ घुमड़ के करिया बादर, अबड़ गा बरसाय।।
नदिया नरवा छलकत हावय,आय हवय उफान।
हरियर हरियर दिखत हावय,खेत अउ खलिहान।।


रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद रायपुर छत्तीसगढ़
 छंद  साधक कक्षा - 4

दोहा

दोहा नारी जग की तारणी

1. नारी ममता रूप है,करो सभी जी मान।
नारी जग की तारिणी, नारी होत महान।।

2. दो कुल में दीपक जला, करती है उजियार
घर मा नारी के बिना,सुना हे परिवार।।

3. करती भव से पार माँ, जब जब आफत आय।
दुर्गा लक्ष्मी शारदा, बन के ओ डट जाय।।

4. नारी जग की तारिणी,करो नही अपमान।
नारी जीवन दायनी,करो सभी सम्मान।।

5. नारी रूप अनेक हे, जग में ली अवतार।
सेवा नारी के करो,पूजे सब संसार।।

रचनाकार :- राजेश कुमार निषाद रायपुर छत्तीसगढ़

त्रिभंगी छंद

।।त्रिभंगी छंद।।

मँय अँव अज्ञानी,गुरु बड़ ज्ञानी,ज्ञान जोत ला मोर भरव ।
सच बोलत हँव अब,सुनले गुरु सब,मन के दुख ला मोर हरव।
मैं कहना मानँव,गुरुजी जानँव,ज्ञान देय के कृपा करव।
नइ करहूँ गड़बड़,पाहूँ अड़बड़,बात मान अब मोर धरव।

रचनाकर :- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद रायपुर छत्तीसगढ़

सोमवार, 29 जून 2020

माँ का आँचल

।। माँ का आँचल।।
कलकल करती मधुर ध्वनि,
गीत प्रेम की गाती है।
माँ के आँचल जैसा कहीं नही,
जब ओ लोरी गा के सुलाती है।
जब जब मैं रोता हूँ ,
झट से मुझे उठा लेती है।
चुप न मैं जब होता हूँ,
तो अपने सीने से लगा लेती है।
मेरे नखरों को कितना सहन करती है,
फिर भी ओ मुझे अपने पास रखती है।
मुझको मुन्ना राजा कहकर,
माँ हमेशा बुलाती है।
माँ के आँचल जैसा कहीं नही,
जब ओ लोरी गा के सुलाती है।
मैं छोटा बच्चा आँख का तारा हूँ,
अपने माँ का मैं लाडला प्यारा हूँ।
जब जब मेरे किलकारी,
गुंजता है घर में ।
मेरे रोने की आवाज सुनकर,
माँ दौड़े आती है पल भर में।
समझ तो नही है मुझमें ,
पर बदमाशी न कर बेटा कहती है।
माँ के आँचल जैसा कहीं नही,
जब ओ लोरी गा के सुलाती है।

रचनाकार :-  राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद
रायपुर छत्तीसगढ़

रविवार, 28 जून 2020

कोरोना पर जागरण

।।आल्हा छंद।।
कोरोना पर जन जागरण 

घुमव फिरव झन बाहिर जादा, राहव घर मा सबझन साथ।
कोरोना ले बचहू भइया, धोवव घेरी बेरी हाथ।।

करो सफाई कोना कोना,घर के अपन सबो हा आज।
मिलके हाथ बटावव संगी,करव नही गा थोरिक लाज।।

दुरिहा दुरिहा सबझन राहव,अइसन डॉक्टर बात बताय।
बचबो कोरोना ले भइया, करबो जब ये हमन उपाय।।

जावव झन गा काम बुता मा,कोरोना ले तो डर जाव।
घर के भीतर रहिके संगी,जान अपन गा सबो बचाव।।

बासी खाना ला झन खाहू, खावव बढ़िया ताते तात।
गरम गरम गा पीहू पानी,तब तो जाके बनही बात।।

मिलना जुलना बंद करव अब,छोड़व सबो मिलाना हाथ।
आवत जावत गली खोर मा,राखव गमछा हरदम साथ।।

आय महामारी जी येहर,रोग भयंकर भारी जान।
हल्का मा झन लेवव येला,लेवत हावय सबके प्राण।।

रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद (समोदा) जिला रायपुर छत्तीसगढ़

छप्पय छंद

काटत हावय पेड़,कहाँ ले छइयाँ पाबो।
बिना पेड़ के आज,हवा बिन सब मर जाबो।।
नइ बच ही जब पेड़,धरा बंजर हो जाही।                                           बढ़ जाही बड़ ताप,छाँव बर सब पछताही।।

।।राजेश कुमार निषाद।।

आल्हा छंद साफ सफाई

।। आल्हा छंद।।
साफ सफाई सपना होगे, देवव अब तो सबो धियान।
आओ मिलके हाथ बँटाबो,नवा चलाबो गा अभियान।।

घर अँगना के करो सफाई,कोना कोना दिखही साफ।
जतर कतर मत फेंको कचरा,करय नही गा कोनो माफ ।।

जमा करो गा एक जगा सब,डालो कचरा कूड़ेदान।
पचर पचर मत थूको संगी,खाके गुटखा पाउच पान।।

घर घर मा  बनही शौचालय, जाहू झन गा बाहर आज।
बात बताहू सबला संगी,करही बहु बेटी झन लाज।।

आदत बनही सबके संगी, जाही लइका बुढ़ा जवान।
देख सफल हो जाही हमरो,हमन चलाबो जो अभियान।।

मंदिर मसजिद अउ सचिवालय,करो सफाई मिलके रोज।
होय सफाई तन के भितरी, फेंकव मनके कचरा खोज।।

गली गली मा जाके संगी,मिलके करबो सब परचार।
साफ रखव सब गली खोर ला,इही हवय गा जीवन सार।।

राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद पोस्ट समोदा तहसील आरंग जिला रायपुर छत्तीसगढ़
8770649541

आल्हा छंद मैं बनिहार

मैं बनिहार ( आल्हा छंद )
बड़े बिहनिया जाथँव संगी,काम बुता मा मैंहर रोज।
घर के संसो छाये रहिथे,जाके करथँव दिनभर खोज।।

एती ओती जाके करथँव,काम बुता ला मैं बनिहार।
जब थक हारे घर मा आथँव,हो जाथे गा बड़ अँधियार।।

बड़ करलाई हावय भइया, देखव लइका मनके मोर।
रोजी रोटी बर मैं लड़थँव,अपन कमाथँव जाँगर टोर।।

घाम प्यास ला मैं नइ देखँव,करथँव काम बुता दिन रात।
लाँघन भूखन झन राहय जी,लइका मनहा सोचँव बात।।

भरे मझनिया करते रहिथँव,नही कभू मैं खोजँव  छाँव।
लक लक तीपे रहिथे भुइयाँ,चट ले जरथे मोरो पाँव।।

कभू खनव मैं माटी गोदी,अउ ढेला पथरा ला फोड़।
महल अटारी घलो बनाथँव,रच रच ईंटा मैंहर जोड़।।

टप टप चूहे भले पसीना,राहय खुश मोरो परिवार।
जउन बुलाही काम बुता मा,जाके करहूँ मैं बनिहार।।

रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद (समोदा) जिला रायपुर छत्तीसगढ़

गरमी के दिन

।।गरमी के दिन ।।

सुनले  सूरज हे भगवान,काबर  करथस तैं हलकान।
आथव बड़े बिहनिया आप,बड़गे हावय अड़बड़ ताप।    
                                                      
आगी जइसन करथस घाम, उसना जावत तन के चाम। 
होगे होही कोनो पाप,करबो देवा तोरोे जाप।।

गरमी के दिन जब जब आय,तरिया नदियाँ सबो अटाय।
गरमी ले हे सब थर्राय, कूलर पंखा काम न आय।।
                                 
भुइयाँ मा चट जरथे पाँव, तन हा खोजत रहिथे छाँव।।
घेरी बेरी गला सुखाय,अबड़ पछीना हा चुचवाय।।      
                                                     
ज्ञानी मनखे ज्ञान सुझाय,नेकी के वो बात बताय।
पेड़ लगा के करो उपाय,जेकर से सब राहत पाय।।                                                          

बरसा के जल सबो बचाव, तरिया डबरी बाँध बनाव।।
बंद करव प्लास्टिक उपयोग, तभे दूर ये होही रोग।।

रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद रायपुर छत्तीसगढ़

चौपाई छंद

।।चौपाई छंद।। जात पात, ऊँच नीच, भेद भाव  सुनलव बहिनी सुनलव भाई।  ऊँच नीच के करव बिदाई।। रहव बनाके भाई चारा। छुआ-छूत ला करव किनारा।। हिन्दू म...