।।त्रिभंगी छंद।।
मँय अँव अज्ञानी,गुरु बड़ ज्ञानी,ज्ञान जोत ला मोर भरव ।
सच बोलत हँव अब,सुनले गुरु सब,मन के दुख ला मोर हरव।
मैं कहना मानँव,गुरुजी जानँव,ज्ञान देय के कृपा करव।
नइ करहूँ गड़बड़,पाहूँ अड़बड़,बात मान अब मोर धरव।
रचनाकर :- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद रायपुर छत्तीसगढ़
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