।। बाल कविता - मुर्गा ।।
कुकडूू कु करके बाँग लगाता,
रोज सुबह हमें जगाता।
रंग बिरंगे पँखो वाले,
चले अकड़ के चोंच निकाले।
कानों में है रस घोलता,
चढ़के छत पर वह बोलता।
सुबह हो गयी सब उठ जाओ,
छोड़ो बिस्तर अब नींद भगाओ।
गली गली में घूमता फिरता,
नही किसी से कुछ कहता।
कचरों में जाकर दाना ढूँढता,
खाना उसको यहीं पर मिलता।
मुर्गा लगे सबको प्यारा,
करता है ओ काम हमारा।
सुबह सुबह अलार्म बजाता,
रोज हमें नींद से जगाता।
रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद
रायपुर छत्तीसगढ़।
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