रविवार, 28 जून 2020

आल्हा छंद मैं बनिहार

मैं बनिहार ( आल्हा छंद )
बड़े बिहनिया जाथँव संगी,काम बुता मा मैंहर रोज।
घर के संसो छाये रहिथे,जाके करथँव दिनभर खोज।।

एती ओती जाके करथँव,काम बुता ला मैं बनिहार।
जब थक हारे घर मा आथँव,हो जाथे गा बड़ अँधियार।।

बड़ करलाई हावय भइया, देखव लइका मनके मोर।
रोजी रोटी बर मैं लड़थँव,अपन कमाथँव जाँगर टोर।।

घाम प्यास ला मैं नइ देखँव,करथँव काम बुता दिन रात।
लाँघन भूखन झन राहय जी,लइका मनहा सोचँव बात।।

भरे मझनिया करते रहिथँव,नही कभू मैं खोजँव  छाँव।
लक लक तीपे रहिथे भुइयाँ,चट ले जरथे मोरो पाँव।।

कभू खनव मैं माटी गोदी,अउ ढेला पथरा ला फोड़।
महल अटारी घलो बनाथँव,रच रच ईंटा मैंहर जोड़।।

टप टप चूहे भले पसीना,राहय खुश मोरो परिवार।
जउन बुलाही काम बुता मा,जाके करहूँ मैं बनिहार।।

रचनाकार:- राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद (समोदा) जिला रायपुर छत्तीसगढ़

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