।। बेटी ल दव शिक्षा अऊ संस्कार ।।
कोनो अपन बेटी ल देवव झन मार,
बेटी ल घलो बेटा बरोबर करो प्यार।
बेटी बर घलो बने होहि ये संसार,
बेटी ल भी दव शिक्षा अऊ संस्कार।।
जब तुमन थके मांदे घर म आथव,
त बेटी ह सब ल हंसाथे।
बेटी बर तुमन मया नई करव,
तभो ले वोहा अपन मया लुटाथे।
मान लव तुमन बेटी ल बेटा बरोबर
अपन जीवन के अधार।
बेटी ल भी दव शिक्षा अऊ संस्कार।।
बेटी हरय घर के लक्ष्मी,
सबो के चिंता ल दूर करथे जी।
सबके राजदुलारी बिटिया रानी,
घर आँगन ल महकाथे जी।
येकरे ले तो सजथे ग घर अऊ दुवार
बेटी ल भी दव शिक्षा अऊ संस्कार।
बेटी जनम धरे हावय जग मा,
घर घर म जाके ये भरम मिटाही।
बेटी कभू काकरो बर बोझ नइ होवय,
सब समाज मा ये अलख जगाही।
जेन बेटी ले मया करे बर नई जानय,
ओकर जीना हावय ग धिक्कार।
बेटी ल भी दव शिक्षा अऊ संस्कार।
कहिथव न की नारी पढ़ही
त विकास करही।
या पढ़ा लिखा दव नारी ल
एक लईका के महतारी ल।
बेटी बेटा म भेद झन करव
लावव ग नवा विचार
बेटी ल भी दव शिक्षा अऊ संस्कार।
रचनाकार ÷ राजेश कुमार निषाद
ग्राम चपरीद ( समोदा )
9713872983
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