गुरुवार, 16 अगस्त 2018

ले जा मोर राखी के संदेसा


 ।।  ले जा मोर राखी के संदेसा ।।
ले जा मोर राखी के संदेसा,ये मयारू मैना मोर।
राखी तिहार आगे हे तीर मा,तै मोला झन अगोर।
बड़ दुरिहा म रहिथे मोर भईया,मोला सोरियावत होही।
बहिनी के मया ल भुलाही कईसे,घर मा गोठियावत होही।
धीरे धीरे जाबे  रेे मैना,झन करबे तैैंहर जादा शोर।
ले जा मोर राखी के संदेसा,ये मयारू मैना मोर।
खेलई कुदई ल कईसे भुलावंव, मैं हर लईका पन के।
भईया मोर राहय संगवारी, सुरता आवत बचपन के।
तीर म राहंव  भइया के,मयाा दुलार ल पावँव।
राखी के तिहार मा ,भइया केे कलाई  म राखी बांधँव।
जाके भइया ल कहिबे, सुरता करत रहिथे बहिनी तोर।
ले जा मोर राखी के संदेसा, ये मयारू मैना मोर।
राखी  के तिहार  हा, साल म एकेच बार आथे।
पर भाई बहिनी के मया ल कोनो कहाँ भुलाथे।
बड़ सुघ्घर रखी के तिहार,पावन तिहार कहाथेे।
बहिनी के रक्षा  करे बर, वचन भाई ह निभाथे।
अइसे लगत हे मोला, देख आतेंव भईया ल मोर
ले जा मोर राखी के संदेसा,ये मयारू मैना मोर।
राखी तिहार आगे हे तीर मा,अब तै मोला झन अगोर।

रचनाकार ÷ राजेश कुमार निषाद ग्राम चपरीद ( समोदा )रायपुर छहत्तीसगढ़.

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